किसानों के लिए बड़ा खबर! अब बिना फार्मर आईडी नहीं मिलेगी खाद? जाने सही रुल!

क्या अब बिना फार्मर आईडी के खाद नहीं मिलेगी?

बिहार के किसानों के बीच इन दिनों एक नई चर्चा तेजी से चल रही है। बात हो रही है डीएपी, यूरिया, पोटाश और अन्य उर्वरकों की खरीद को लेकर लागू किए जा रहे नए नियमों की। कई किसानों का कहना है कि अब खाद खरीदने के लिए जमीन की रसीद और फार्मर आईडी दिखाना अनिवार्य किया जा रहा है।

चिंतित किसान खेत में बैठा हुआ है। सामने डीएपी, यूरिया और पोटाश की बोरी, जमीन की रसीद, फार्मर आईडी और ताला-चेन दिखाई दे रहे हैं। पृष्ठभूमि में काले बादल और खेत का दृश्य है। बड़े अक्षरों में लिखा है, "अब किसान बर्बाद?" जो किसानों के सामने खाद खरीद से जुड़ी नई चुनौतियों को दर्शाता है।
फार्मर आईडी और जमीन की रसीद के बिना खाद मिलने पर सवाल! नए नियमों को लेकर किसानों में चिंता बढ़ी

अगर यह व्यवस्था पूरी तरह लागू होती है, तो इसका असर लाखों किसानों पर पड़ सकता है, खासकर उन किसानों पर जो वर्षों से खेती तो कर रहे हैं लेकिन जमीन अभी भी उनके पिता, दादा या अन्य पूर्वजों के नाम पर दर्ज है।
आखिर नया नियम क्या है, किसानों की चिंता क्या है और सरकार का उद्देश्य क्या है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।

पहले कैसे मिलती थी खाद?

कुछ साल पहले तक किसान किसी भी अधिकृत खाद दुकान या डीलर के पास जाकर जरूरत के अनुसार डीएपी, यूरिया या अन्य उर्वरक खरीद लेते थे।
खाद खरीदने के लिए केवल पैसा देना होता था और जरूरत पड़ने पर आधार कार्ड या पहचान पत्र दिखाना पड़ता था। अधिकांश जगहों पर जमीन से जुड़े दस्तावेजों की मांग नहीं होती थी।
लेकिन अब व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है।

नए नियम में क्या बताया जा रहा है?

किसानों के बीच जो जानकारी सामने आ रही है, उसके अनुसार खाद खरीदने के लिए निम्न दस्तावेज मांगे जा सकते हैं-

1. जमीन की रसीद (लगान रसीद)

जिस जमीन पर खेती की जा रही है, उसकी अद्यतन रसीद दिखानी पड़ सकती है।

2. फार्मर आईडी

किसान की पहचान और कृषि योजनाओं के लाभ को एक प्लेटफॉर्म से जोड़ने के लिए फार्मर आईडी को महत्व दिया जा रहा है।

3. आधार आधारित सत्यापन

कुछ जगहों पर बायोमेट्रिक सत्यापन या आधार प्रमाणीकरण की व्यवस्था भी की जा सकती है।सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खाद वास्तविक किसानों तक पहुंचे और कालाबाजारी पर रोक लगे।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

असल समस्या यहां से शुरू होती है।
बिहार सहित देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में किसान ऐसी जमीन पर खेती करते हैं जो अभी भी उनके पूर्वजों के नाम पर दर्ज है।

गांवों में अक्सर देखने को मिलता है कि-

जमीन का बंटवारा मौखिक रूप से हो चुका है।
खेती अलग-अलग परिवार कर रहे हैं।
लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में नाम अभी भी दादा या पिता का दर्ज है।
दाखिल-खारिज और जमाबंदी का काम वर्षों से लंबित है।
ऐसी स्थिति में किसान खेती तो कर रहा है, लेकिन उसके नाम पर जमीन नहीं है।

फार्मर आईडी बनवाने में क्यों आ रही है दिक्कत?

कई किसानों का कहना है कि फार्मर आईडी बनवाने के दौरान भूमि रिकॉर्ड की जांच की जाती है।
यदि जमीन किसान के नाम पर नहीं है तो आवेदन प्रक्रिया में परेशानी आती है।
यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में किसान फार्मर आईडी नहीं बनवा पाए हैं।
कई किसान शिविरों में आवेदन करने जाते हैं लेकिन दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण उनका पंजीकरण लंबित रह जाता है।

सरकार ऐसा क्यों कर रही है?

इस फैसले के पीछे सरकार की कुछ महत्वपूर्ण वजहें भी हैं।

कालाबाजारी रोकना
अक्सर शिकायत मिलती है कि कुछ लोग बड़ी मात्रा में खाद खरीदकर जमा कर लेते हैं और बाद में अधिक कीमत पर बेचते हैं।

असली किसान की पहचान
सरकार चाहती है कि कृषि से जुड़े लाभ सीधे वास्तविक किसानों तक पहुंचें।

योजनाओं का एकीकरण
भविष्य में पीएम किसान, कृषि अनुदान, बीज वितरण और अन्य योजनाओं को फार्मर आईडी से जोड़ा जा सकता है।

किसानों की मांग क्या है?

किसानों का कहना है कि नियम लागू करने से पहले जमीन संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए।

उनकी मांग है कि-

– पैतृक जमीन पर खेती करने वालों को भी अस्थायी राहत मिले।
– फार्मर आईडी बनाने की प्रक्रिया आसान बनाई जाए।
– जमीन नामांतरण और दाखिल-खारिज के मामलों का तेजी से निपटारा हो।
– छोटे और सीमांत किसानों को विशेष सुविधा दी जाए।
किसानों का मानना है कि जब तक भूमि रिकॉर्ड की समस्या दूर नहीं होगी, तब तक लाखों किसान नई व्यवस्था में फंस सकते हैं।

खेती और किसान दोनों हैं देश की रीढ़

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किसान देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं।
खेत में मेहनत करने वाला किसान ही गेहूं, धान, मक्का, दाल और सब्जियां उगाकर पूरे देश का पेट भरता है।
यदि किसानों को समय पर खाद, बीज और कृषि संसाधन नहीं मिलेंगे तो इसका असर केवल किसान पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।

इसलिए जरूरी है कि सरकार और किसान संगठन मिलकर ऐसा समाधान निकालें जिससे पारदर्शिता भी बनी रहे और वास्तविक किसानों को परेशानी भी न हो।

खाद वितरण व्यवस्था में बदलाव का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना और कालाबाजारी रोकना है।

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