बिहार पर कितना कर्ज, वाकई कर्ज में डूब रहा है बिहार?
जब भी सरकार के बजट की बात आती है, एक सवाल हर किसी के मन में होता है- आखिर बिहार पर कितना कर्ज है? सोशल मीडिया पर दावे बहुत हैं, लेकिन सच क्या है? आइए, बिना किसी भारी-भरकम किताबी भाषा के इसे समझते हैं।

बिहार पर कितना कर्ज है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार पर करीब 3.74 लाख करोड़ रुपये का बकाया कर्ज है। अगर हम राज्य की 13 करोड़ की आबादी को देखें, तो हर व्यक्ति पर औसतन 28 से 29 हजार रुपये का कर्ज है।
लेकिन घबराइए मत, यह कर्ज आपको अपनी जेब से नहीं चुकाना है। यह राज्य सरकार का है, जिसे वह अपनी कमाई और विकास कार्यों से मिलने वाले रिटर्न से चुकाती है।
सरकार कर्ज क्यों लेती है?
इसे एक उदाहरण से समझिए। अगर आप घर बनाने के लिए लोन लेते हैं, तो वह कर्ज आपको एक नई संपत्ति (घर) देता है। सरकार भी वही करती है। जब वह सड़कें, पुल, स्कूल या बिजली के पावर ग्रिड बनाती है, तो उसे ‘कैपिटल एक्सपेंडिचर’ कहते हैं। यह निवेश है, जिससे भविष्य में व्यापार बढ़ेगा और राज्य की अपनी कमाई भी बढ़ेगी।
क्या यह चिंता की बात है?
यहीं पर असली पेंच है। अर्थशास्त्री Debt-to-GSDP Ratio देखते हैं। यानी राज्य की कुल अर्थव्यवस्था के मुकाबले कर्ज कितना है। बिहार के लिए यह आंकड़ा करीब 37% है। यह थोड़ा ज्यादा जरूर है, क्योंकि आदर्श स्थिति में इसे 20-25% के आसपास होना चाहिए।
चिंता की असली वजह- कर्ज लेना बुरा नहीं है, लेकिन कर्ज का एक बड़ा हिस्सा ‘ब्याज’ (Interest) चुकाने में चला जाना चिंताजनक है। बिहार सरकार अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज भरने में खर्च कर देती है। इसका मतलब यह है कि जो पैसा सड़कों और अस्पतालों में लगना चाहिए था, वह बैंकों की जेब में जा रहा है।
बिहार की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
बिहार की अपनी कमाई (GST, स्टाम्प ड्यूटी, वाहन कर) उतनी नहीं है जितनी कि एक बड़े राज्य को होनी चाहिए। आज भी राज्य का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की मदद और हिस्सेदारी पर टिका है। जब अपनी कमाई कम होती है, तो सरकार को विकास कार्य जारी रखने के लिए मजबूरी में उधार लेना पड़ता है।
क्या हमें डरना चाहिए?
बिहार न तो रातों-रात कर्ज में डूब रहा है और न ही बहुत सुरक्षित स्थिति में है। सच्चाई बीच में है। सरकार का कर्ज लेना गलत नहीं है, बशर्ते वह पैसा ऐसे कामों में लगे जिससे राज्य में उद्योग लगें और लोगों को रोजगार मिले। यदि कर्ज केवल सरकारी योजनाओं और वेतन देने में ही खर्च होता रहेगा, तो कर्ज का यह चक्र और बड़ा होता जाएगा।
आने वाले समय में बस एक ही चीज़ देखनी होगी- क्या सरकार अपनी खुद की कमाई के स्रोत बढ़ा पा रही है या फिर हम हमेशा के लिए उधार और केंद्र की मदद पर ही निर्भर रहेंगे? धन्यवाद-





